कौन हूँ मैं

तो क्या हुआ,
जो बज़्म* में तेरे नहीं हूँ मौजूद मैं,
तो क्या हुआ जो तेरे पास नहीं हूँ मैं,
तेरे साथ हूँ मैं,
तेरे हर एक डगर में,
एक “राही” सा हूँ मैं,
आँखों में फैले काजल में हूँ मैं,
तेरे हर एक कदम में,
उस मोड़,
इस ठिकाने,
तेरी ख़ामोशी में,
तेरी ख़्वाईश में,
हूँ मैं,
तेरी इस मुतमइन* सी ज़िंदगी में,
एक तूफाँ सा हूँ मैं,
तेरी इबादतों* में हूँ मैं,
तेरी नाराज़गी में,
तेरी उन अल्हड़* मुस्कुराहटों में,
तेरे काकुलों* में उलझी उन हवाओं में,
लहरों की बेचैनियों में,
और किनारों की शांति में हूँ मैं,
मशरिक़* से शुरू,
ज़िंदगी की एक फ़रोज़ाँ* सी पतंग हूँ मैं,
मग़रिब* की गोद में पली,
वो चाँदनी हूँ मैं,
तो कैसे कहता है तू,
कि मैं तेरे साथ नहीं
मैं ना मिलूँ तुम्हे कभी,
तुम मुझे ढूँढ जो रहे|

– आयुष झा “राही”

बज़्म – सभा

मुतमइन- संतुष्ट

इबादतों- प्रार्थना

अल्हड़- भोला

काकुल-बाल की घूमी हुई लटें

फ़रोज़ाँ- रौशन

मशरिक़- पुरब

मग़रिब- पश्चिम

Advertisements

अमर

“इस घर को छोड़ क्यों नहीं देते वो”, “किस मनहूस घड़ी में खरीदा था ये घर उन्होंने, यहाँ आने के 4 महीने बाद ही उनकी पत्नी गुज़र गयी, और इकलौता बेटा भी उन्हें अकेला छोड़कर चला गया”, “हाँ आख़िर कौन रहेगा ऐसे मनहूस घर में”, “और कोई किरायदार देखेने भी आए तो उन्हें ये कहकर भगा देते हैं कि घर खाली नहीं हैं”, “अरे मुझे तो यह लगता है कि वो पागल हो चुके हैं, अक्सर मैंने उन्हें अकेलेपन में खुदसे बातें करते सुना है”, “अरे मैं तो तंग आ गयी हूँ इस बुड्ढे से, देर रात तक बर्तन पीटता रहता है, मेरी तो नींद ही खराब हो जाती है”, “हाँ सही में बुड्ढा पागल हो गया है।” अक्सर मोहल्ले में शर्माजी और उनके इस मनहूस घर के बारे में यूँ ही चर्चे हुआ करते थे। मोहल्ले की कुछ औरतें उनकी पत्नी के गुज़र जाने का शोख़ मनाती थीं, तो कुछ औरतें उनके बेटे के खुदगर्ज़ी को कोसा करतीं थीं, कुछ तो ऐसी भी थीं जो उनको सनकी और पागल समझती थीं, क्योंकि वो देर रात तक ड्रम बजाया करते थे। पत्नी का अंतिम संस्कार करने बाद उन्होंने घर आते ही सबसे पहले अपना ड्रम ही बजाया था। इस घटना के बाद से मोहल्ले में ये खबर फैलने लगी थी कि शर्मा जी दिमागी रूप से बीमार हो चुके हैं। यूँ तो मोहल्ले में किसी भी मुद्दे को लेकर एक सहमति नहीं बनती थी, मगर एक बात थी जो सभी ने मानी थी, कि “अमर” जो की शर्मा जी के मकान का नाम था वो एक मनहूस मकान था और शर्मा जी की सारी तकलीफ़ें उस घर में प्रवेश करने के बाद ही शुरू हुई थीं।

शर्मा जी का पूरा नाम अरुणोदय शर्मा था और वो दिल्ली विश्विद्यालय के हिन्दू कॉलेज में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर थे। बड़े ही ईमानदार, मेहनती और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के थे और इसी के साथ-साथ खुशमिजाज़ और मस्तमौला इंसान थे। ज़िन्दगी में कितनी भी बड़ी मुश्किल क्यूँ न आ जाए पर शर्मा जी की मुस्कुराहट वैसी ही बनी रहती थी। शेर-ओ-शाइरी का खूब शौक रखते थे, और बचपन से ही रॉक म्यूजिक के दीवाने थे, इसीलिए नौकरी करने के कुछ महीनों बाद ही उन्होंने एक ड्रम-सेट ले लिया था और हर शाम उसे बजाया करते थे। दिलचस्प बात तो ये है कि, वो बचपन से ही एक संगीतकार बनना चाहते थे मगर परिवार की आर्थिक स्तिथि को देखकर उन्होंने अपने इस सपने को दबा दिया, बिना किसी शिकन और मलाल के अपने आप को पढ़ाई-लिखाई में झोंक दिया। वो हमेशा दोहराया करते थे कि, “ज़िंदगी बड़ी छोटी है, हर पल बदलती है, इसे चिंता और मलाल कर गवाना नहीं चाहिए” उनको ये फ़ारसी शेर,गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त/ हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त” (धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं) बेहद पसंद था।

अपने कॉलेज के दिनों से ही उन्हें उनके साथ पढ़ने वाली एक लडक़ी से मोहब्बत थी और आगे चल कर उसी से शादी भी की। उनकी पत्नी श्रीमती ललिता शर्मा एक N.G.O के साथ जुड़ी हुईं थीं। दोनो के ईमानदार होने का ये परिणाम था कि शादी के बाद वो एक कमरे वाले एक घर में रहते थे उसके बाद जब उनको एक बेटा हुआ तब उसकी ज़रूरतों को मद्दे नज़र रखते हुए वो दोनो एक दो कमरे वाले घर में शिफ्ट हुए। 25 साल की नौकरी के बाद एक-एक पाई जोड़कर उन्होंने “अमर” को 2 साल पहले ही खरीदा था। अपने बेटे की पढ़ाई में दोनों ने कोई कमी न रखी और उसे बहुत अच्छे संस्कार भी दिए, जिसके कारण वो आगे चलकर एक मल्टी-नॅशनल कंपनी का C.E.O बना।

जब कभी भी कोई किरायदार उनसे घर के सिसलसले में बात करने आता तो उसको वो अपने बेटे की कहानी ज़रूर सुनाते थे। “अमर” नाम ललिता जी के द्वारा ही दिया गया था। शादी के बाद से ही दोनों मीयाँ-बीवी का एक ही सपना था कि उनका अपना एक घर हो। ललिता जी के गुज़रने के बाद मकान का नीचे का हिस्सा खाली ही रहता था, क्योंकि शर्मा जी ऊपर अपनी लाइब्रेरी में ही रहते थे और सिर्फ रात को ड्रम बजाने नीचे आया करते थे। ललिता जी के मरने के 1 साल तक किरायदार घर लेने के लिए आते रहे मगर हर किसीको शर्मा जी लौटा देते थे। हर किरायदार उनसे उस बीच वाले कमरे में रखे उनके ड्रम-सेट और उसी कमरे के कोने में रखी एक कुर्सी को हटाने की माँग करता और उन्हें शर्मा जी ये कहकर लौटा दिया करते थे की कमरा खाली नहीं है। ऊपर वाला कमरा जिसमे लाइब्रेरी बनी थी काफी छोटा था, इसीलिए उसमे कोई रहना नहीं चाहता था। किताबों के सिवाय वहाँ सिर्फ एक कुर्सी और एक टेबल थी जहाँ शर्मा जी घर की सफ़ाई के बाद दिनभर रहते थे और पढ़ते थे, मन किया तो खा लिया नहीं तो भूखे ही रह जाते थे। रात को ड्रम बजा उसी ऊपरवाले कमरे में लगी कुर्सी पर सो जाया करते थे। अब तो कोई किरायदार भी नहीं आता था। मोहल्ले का वो कोना पूरे दिन शांत रहता और रात के 10 बजे के बाद ड्रम की आवाज़ के जाग उठता था। पड़ोसियों ने और अगल-बगल वाले कई लोगों ने उनके ख़िलाफ़ शिकायत भी करी थी मगर कोई फायदा न हुआ। ललिताजी की मौत से पहले शर्माजी हर दिन 6 बजे से लेकर 7:30 बजे तक ड्रम बजाया करते थे मगर उनके जाने के बाद अब वो हर रात 9 बजे से लेकर देर रात 12 बजे तक चलती थी। शर्मा जी ने नौकरी भी छोड़ दी थी, अब न किसी से मिलते थे और न ही कभी बाहर निकलते थे। जो मुस्कान कभी हटती नहीं थी आज एक अरसा हो गया था उसे देखे।

बड़े दिनों बाद एक दिन किसी किरायदार ने फिर से “अमर” का दरवाज़ा खटखटाया, एक जवान लड़का था करीब 22-23 साल का, कुछ खास था मगर जाना-पहचाना सा कुछ था उसके व्यक्तित्व में, उसकी मुस्कुराहट! हूबहू शर्मा जी जैसी थी वैसा ही सुकून औए शांति का भाव था उसके चेहरे पर। शर्मा जी ने उसे अंदर बिठाया अपने बेटे की कहानी सुनाई और उसे मना करने ही जा रहे थे कि उस लड़के की नज़र बीच वाले कमरे में रखे उस ड्रम-सेट पर पड़ी और वो अचानक से उठा और उसके पास जाके खड़ा हो गया उसे निहारने लगा। उसने कहा कि उसके पिताजी को भी ड्रम बजाने का शौख था और वो रॉक म्यूजिक के दीवाने थे, बम्बई में एक छोटे-मोटे संगीतकार थे और 1.5 साल पहले 4 मई को रात के ठीक 12 बजे उनकी मौत हुई थी, ये तारिक और ये वक़्त शर्मा जी कैसे भूल सकते थे। 1.5 साल पहले ही 4 मई को ही ठीक रात के 12 बजे ललिता जी की भी मौत हुई थी। ललिता जी कैंसर की मरीज़ थीं और डॉक्टरों ने भी अपने हाथ खड़े कर लिए थे। मरने से पहले शर्माजी ललिताजी का वो सपना पूरा करना चाहते थे, मगर इलाज में भी बहुत से पैसे खर्च हो चुके थे और आगे भी इलाज में होने थे। शर्माजी अपनी सारी पूँजी, एक-एक पैसा जोड़कर ललिताजी की मौत से ठीक 4 महीने पहले उनके 62 वें जन्मदिवस पर उन्हें तोहफ़े के तौर पर “अमर” दिया था। ललिता जी को पता था कि वो ज़्यादा दिनों तक जी नहीं पाएँगी, इसीलिए वो चाहती थीं कि शर्माजी उनके इलाज पर पैसे न खर्च करें और उसे अपने बेटे के लिए बचा कर रखें।

4 मई की रोज़ रात 8 बजे के करीब ललिताजी की तबियत बिगड़ने लगी शर्माजी उन्हें अस्पताल ले जा रहे थे कि ललिताजी ने शर्माजी का हाथ पकड़ा और उनसे कहा कि,”मैंने तुम्हारा हाथ पकड़कर इस रिश्ते में कदम रखा था, और आज तुम्हरा हाथ पकड़ ही इसे अमर करना चाहती हूँ। जाने से पहले तुम्हें चिंतित और व्याकुल नहीं बल्कि खुशमिजाज़ और अपने ड्रम में मगन देखना चाहती हूँ, जाने से पहले मैं तुम्हें हँसता हुआ देखना चाहती हूँ”।

उस रात 9 बजे से लेकर 12 बजे तक शर्माजी लगतार ड्रम बजाते रहे और कोने में बैठ ललिता जी सुनती रहीं, 3 घंटे तक लगातार ड्रम बजाने के बाद जब शर्माजी ने एक नज़र ललिताजी पर डाली तो पाया कि वो इस दुनिया को छोड़ जा चुकी थीं। शर्माजी के ड्रम की आवाज़ ने उनके शरीर में उठ रहे सभी दर्द के स्वरों को शांत कर दिया था, सारी तकलीफ़ों को दूर कर दिया था। उनके चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी, एक अजीब सी चमक, वो रूहानियत मानो जैसे ईश्वर स्वयम उनकी अंतिम यात्रा के सारथी हों। वो कई रातों से सोई नहीं थीं मगर आज एक ऐसी नींद के आग़ोश में जा चुकीं थीं जहाँ सिर्फ शांति ही शांति थी, जहाँ कोई दर्द नहीं कोई बेचैनियाँ नहीं, सिर्फ आराम ही आराम था। शर्माजी उस दिन के बाद से हर रात 9 बजे से लेकर 12 बजे तक ड्रम बजाते हैं, ये सोचकर कि उनकी पत्नी जहाँ कहीं भी हो उनके ड्रम की धुन सुनकर सुकून से सो सकें। उनका बेटा ये जानता था कि शर्माजी कभी भी “अमर” अलग नहीं होंगें इसीलिए वो 5 साल के लिए अमरिका चला गया था।

उस किरायदार ने शर्माजी से ड्रम बजाने की दरख़्वास्त की और उस दिन 1.5 साल में पहली बार “अमर” से ड्रम की आवाज़ के साथ-साथ हँसी के ठहाके भी सुनाई पड़े। पहली बार कोई किरायदार उस घर से लौटा नहीं था। 1.5 साल मेंपहली बार शर्माजी बाहर सैर पर निकले। शर्माजी की मुस्कुराहट लौट आयी थी। अब शर्माजी बच्चों को ड्रम बजाना सिखाते हैं और सिर्फ तभी ड्रम की आवाज़ मोहल्ले में गूँजती है। रात को चैन से सोते हैं और अब सब से मिलते भी हैं और बातें भी करते हैं। फुर्सत मिले तो कभी लाइब्रेरी में बैठ पढ़ भी लेते हैं। शर्माजी को इस बात का सुकून जो है कि ललिताजी जब चाहे ड्रम की उस धुन को सुन सकती हैं। बात रही उस किरायदार की तो उसे “अमर” पसंद ही नहीं आया।😉

शाम एक जो गुज़री यूँ

हर एक इंसान की ज़िंदगी में एक ऐसा मंज़र तो ज़रूर आता है, जो उसे ज़िंदगी के मायने बता जाता है, और वो मंज़र उसे पूरी ज़िंदगी कुछ इस तरह याद रहता है, कि मानो जैसे कल की ही बात हो। बीते पिछले कुछ दिनों में मैं ने अपनी ज़िंदगी के हर एक पल को महसूस कर उसे जीने की कोशिश की है। अब सवाल ये उठता है कि इस कोशिश की वजह क्या थी, वो एक और दिलचस्प कहानी है। इसे किसी और दिन के लिए संभाल कर रखते हैं, बस इतना जान लीजिए कि जब कभी भी मौत हमे छू कर गुज़रती है, तो अक़सर तोहफे के तौर पर ज़िंदगी दे जाती है, मगर ये बात हमे समझ नहीं आती और हम ज़िंदगी की तलाश में निकल पड़ते हैं और इस तलाश का अंत तब होता है जब आप तलाश छोड़ ज़िंदगी को जीना सीख जाते हैं, क्योंकि ज़िंदगी की ये ही तो खासियत है, कि जहाँ जीने की कोशिश होती है वहाँ ज़िंदगी सार नहीं होता, और जब इस बात का अहसास होता है तब हम जीने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसे जीते हैं । ये बात ज़रा देर से समझ आयी मुझे, मगर जब समझ आयी तब ज़िंदगी तो नहीं बदली मगर उसे जीने का सलीका ज़रूर बदल गया, क्योंकि उसे देखने का नज़रिया जो बदल गया था। ये बातें आपको बेबुनियाद लग सकती हैं और ऐसा लगना जायज़ भी है। कुछ चीज़ें महसूस करने पर ही समझ आती हैं।

बनारस में रहने का जो सबसे बड़ा फायदा ये है कि हर दिन आपको ये शहर नये-नये नज़ारों से, अपने एक नये पहलू से, रूबरू कराता है। किसी ने बिलकुल सही ही कहा है कि,”ये ज़िंदा शहर बनारस है” और इस ज़िंदा शहर की धड़कन गंगा है। मैं अक़सर ही गंगा किनारे बसे घाटों पर सैर के लिए जाता हूँ, मौसम दर मौसम यहाँ की फिज़ा बदलती है। ठंड का मौसम था और सर्द हवा भी बह रही थी, अब ऐसे में घाट जाना तो बनता था। मैं और मेरे कुछ दोस्त, हम सारे घाट पर सैर के लिए निकल पड़े। घाट पर हमेशा ही लोगों का तांता लगा रहता है, इसके बावजूद भी आप जब कभी वहाँ जाएँगे तो आपको एक अजीब सी शांति और सुकून का एहसास होगा। ऐसी शांति जो आपको आपके मन के अंदर झाँकने पर मजबूर करदे, आपके मन की सारी परेशानियाँ, सारी बेचैनियाँ, मानो जैसे सुषुप्त सी हो जाती हैं यहाँ। भीड़ का हिस्सा हो कर भी आप उन सब से जुदा होते हैं। आप खुदको गंगा के उस निश्छल जल से जुड़ा हुआ पाते हैं। ये एक ऐसी जगह है जहाँ का सार आपको आगे बढ़ने में नहीं बल्कि ठहर जाने में मिलता है। गंगा और इन घाटों की कितनी भी व्याख्या कर लूँ वो हमेशा कम ही होंगी, क्योंकि हमारे शब्दों के दायरे से परे हैं ये।

घाट पहुँच हम सब ने कुछ देर तक बातें की और उसके बाद गानों का सिलसिला शुरू हुआ। सब ने मिलकर कई गाने गुनगुनाए जैसे, “ये शाम मस्तानी, प्यार दीवाना होता है, मुसाफ़िर हूँ यारों, ओ माझी रे,आफ़रीन आफ़रीन”। पुराने गानों के बोल और उनके संगीत में जैसे एक जादू सा था, एक सच्चाई थी, जो इंसान के भावनाओं के साथ जुड़ जाती थी। आज भी इसलिए आप किसी न किसी कोने में किसी न किसी को ये गाने गुन-गुनाते हुए ज़रूर पाएँगे । अब तेरा प्यार प्यार हुक्का बार के ज़माने में गानों में न ही वो सच्चाई है और न ही वो रूहानियत, जो आपको इस दुनिया से परे खयालों की दुनिया में ले जाए। हरिवंशराय “बच्चन” ने बड़ा खूब कहा है,“की अब न रहे वह पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला”। गाना गा लेने के बाद मेरे कुछ दोस्तों को अपनी तस्वीर खींचाने की इच्छा हुई और घाट पर एक सही जगह ढूँढ वो अपनी तस्वीर खींचाने लगे। मुझे शुरू से ही अपनी तस्वीर खींचाने में कोई दिलचस्पी नहीं रही है और जब कभी भी ऐसा मौका आता है तब मैं तस्वीरनवाज़ बनना ही पसंद करता हूँ।

उसी वक़्त शायद वो नन्हा मासूम किसी कोने में छिपकर यह सब देख रहा था, गंगा और अपने दोस्तों की बज़्म में अपने चारों तरफ की दुनिया को मानो जैसे मैं भूल चुका था। तब ही मैंने अपने पैंट में एक तनाव सा महसूस किया, जैसे कि उसे कोई खींच रहा हो, मैं ने पलट कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था, और उसी वक़्त एक छोटा सा लड़का ठीक मेरे सामने आकर मुझे देख मुस्कुराने लगा, वो इंद्रजीत था। महज़ 2 या 3 साल का एक मासूम सा लड़का। इंद्रजीत के चहरे पर एक वाहिद सी चमक थी, धूल से सना होने के बावजूद भी उसके चहरे की चमक में कहीं से कम नहीं हुई थी। लाल रंग की हाफ-पैंट और ज़र्द रंग की एक टी-शर्ट पहन, इंद्रजीत इस कदर मुझे देख रहा था, जैसे बरसों से मुझे जानता हो। उसकी उस बे-लौस सी मुस्कुराहट कठोर से कठोर दिल को पिघलाने के लिए काफ़ी थी। अपना न होने के बावजूद भी न जाने क्यों मुझे वो अपना सा लगा था उस शाम। उसकी वो बड़ी-बड़ी गोल आँखे मानो मुझसे पूछ रहीं हो कि,” ये कौन सा खिलौना है तुम्हारी हाथों में, जिसे देख लोग इतना मुस्कुराते है, और फ़िर जो एक बिजली सी चमकती है उसके बाद वो मुस्कुराहट कहाँ खो जाती है।

इंद्रजीत, जैसा की मुझे बताया गया था पृथ्वी का छोटा भाई था। अब आप ये सोचेंगे कि ये पृथ्वी कौन है? बिलकुल ऐसा ही सवाल मेरे ज़ेहन में भी उठा था उस वक़्त। मैंने सोचा था कि पृथ्वी कोई 10-12 साल का लड़का होगा। बनारस में गंगा किनारे इस उम्र के कई बच्चे आपको या तो दिये बेचते हुए या फ़िर भीख माँगते हुए दिख जाएँगे। मैंने पृत्वी को इनमे से एक समझा था, मगर जब मेरी एक दोस्त ने उसकी माँ से, जो खुद भी दिये बेचती थी, पृथ्वी के बारे में पूछा तो उसकी माँ ने बगल वाले घाट पर दिये बेच रहे 4-5 साल के एक लड़के की ओर इशारा किया, वो पृथ्वी था। चेहरे पर एक शांत सा भाव, बातों में ठहराव, मन में ढ़ेर सारे किस्से छिपाए पृथ्वी शायद समय से पहले ही बड़ा हो चुका था। उसने शायद अपना बचपन किसी और के नाम कर दिया था।

मैं ने इंद्रजीत की ढ़ेर सारी तस्वीरें खींचीं, इंद्रजीत बड़ा ही खुश हुआ आखिरकार उसने मोबाईल कहे जाने वाले इस खिलौने का जादू जो देख लिया था। उसे शायद इस जादू से बेहतर अपना खेल ही लगा, इसलिए मोबाईल में अपनी तस्वीरें देखने के तुरंत बाद वो वापिस से अपनी उस छोटी सी, निःस्वार्थ दुनिया में लौट गया और फ़िर अपनी शरारतों में व्यस्त हो गया। जितनी बार मुझे देखता मुस्कुराता और फ़िर खेलने लगता। अब उसे न तस्वीर खींचाने में दिलचस्पी थी, और न ही उस खिलौने को जानने में। ज़िंदगी में पहली बार किसी को देख मुझे अपना बचपन याद आया था। जब कभी भी कोई इंसान आपकी किसी पुरानी याद को ताज़ा कर उससे जुड़ जाता है तब वो बहुत अज़ीज़ हो जाता है, ऐसा ही कुछ हुआ था उस शाम मेरे और इंद्रजीत के बीच। एक छोटे से बच्चे ने मुझे ज़िंदगी का आईना दिखा दिया था, उसने मुझे मेरा भुला हुआ बचपन याद दिला दिया था, मुझे उस शक़्स से मिला दिया था जिसे मैंने यादों के किसी पन्ने में कब का दबा दिया था।

ज़िंदगी का खेल ही कुछ ऐसा है, कोई नहीं जानता कि कौन सा शक़्स आपके ज़िंदगी में क्या नये तजुर्बे लेकर आएगा, तो ज़िंदगी को खुली बाहों से अपनाना ही बेहतर है। जहाँ तक बात रही इंद्रजीत की, तो अब जितनी दफ़ा घाट जाता हूँ उस जगह ज़रूर जाता हूँ जहाँ पहली बार मैंने उसे देखा था, उसे ढूँढ़ता हूँ, मगर वो मुझे मिलता ही नहीं और मैं मुस्कुरा कर वापिस लौट आता हूँ। होगा मसरूफ़ कहीं अपनी शरारतों में या मुझ जैसे किसी भटके हुए राही को उसका बचपन लौटाने में।

बच्चा होना बच्चों का खेल नहीं!!!😁😁

The simplest complicated word.

Life, the simplest 4 letter word which we always tend to complicate. Isn’t it strange that we always search for happiness through out our lives, while the fact is that it’s always around us, a mere change in perception is all that we need. But let me tell you very frankly that this change has one and only one teacher assigned to it and that’s life and it’s vivid experiences. It’s not the destination that gives a traveller the pleasure, but the experiences of that journey and it’s realization in the subconscious mind that cumalatively results into peace, satisfaction and ultimate pleasure. Here I remember few lines of my Nazm that I would like to share..

मैं उस सितारे के इंतज़ार में बैठा रहा,
और चाँद अपनी चाँदीनि बिखेरता रहा,
मैं मोहब्बत ढूँढ रहा था,
और वो मेरे साथ चल रहा था,
वो हर रात आता रहा था,
और मैं उसे सुबह तलाशता रहा।

In past few days, while I was in the hospital for my Nasal Surgery, I realized that how lame and easy it is for us to hate and have grudges, but we forget that these things would lead us no where. The more love that we can give and the more humble we can be is that, what is gonna lead us past our shackles of bondage for our Self (ego). I guarantee you the more you give is the more you, but never do anything thinking for the return you would get, because it’s life and not an investment.

When I came out of the Operation Theatre, there was one thing that I was sure about, this new life is a boon for me, I am not gonna waste it. Life has given me a lot and now it’s my turn give it back by simply living it. Enjoy it and just try to be happy.

हम लाए ही क्या थे,

जिसके खो जाने का इतना डर है

पर्दा

एक जो खिड़की है मेरे कमरे में,
और एक है पर्दा वहीं,
बड़ा ही लम्बा,
बड़ा ही मोटा,
सिलवटों में उसकी,
मानो लहरों सी बेचैनी है,
खेलती जहाँ किरणें सूरज की,
आँख-मिचौली,
दो दुनियाँ देख रही ये खिड़की,
एक ओर दरख्तों के नज़ारे,
कोपलों में उलझी हवा,
और हवा में कैद एक ताज़गी,
एक उमंग,
एक शांत सड़क,
और ख़ामोशी का सैलाब,
तो एक ओर हैं ये दीवारें,
हैं कैद जिसमे,
कई सवाल,
कुछ अरमान,
थोड़े आँसू,
एक साँस,
और एक बचपन,
मगर कौन जाने क्या है हकीकत,
जो दिख रहा पर्दे के उस पार,
क्या सराब है,
होंगी कई और भी दुनियाँ,
कुछ जो पर्दे के इस पार,
और कुछ उस पार,
सोचता हूँ मैं कभी,
कि अगर होते ना ये पर्दे तो क्या होता।

– आयुष झा ‘राही’

Ride with companion.

Traveling, exploring, visiting new places, new people has been an essential part of my life. By travel I don’t mean to say just visiting foreign lands or an alienated place, but visiting to all those places where you haven’t been to and intrigues you is traveling, for me atleast.

Being an English (Hons.) student I have studied quite a few essays like “Of travel” by Bacon, “Walking tour” by Robert louis Stevenson and many more imparting the significance of traveling, it’s educational value and the impact it has on thoughts and working. But never in all these periods of my traveling and exploring did I write something about my experiences, adventures and most importantly what I learned. The reason I guess is that I hadn’t experienced something as thrilling and mesmerizing like I experienced few days ago.

It’s been around 6-7 months since I first visited this heaven, called Varanasi or rather Benares. Benares is an entire world in its own, the people, the dialect, the food, the narrow yet lively alleys and not to forget the affair of ghats and the mighty Ganga, everything here has a sense of uniqueness in it. The simplicity that dwells in every nooks and corner intensifies the beauty of this gem.

Not fond of modern marvels, the natural and historical beauties seduce me more. The amalgamation of natural textures and the ease with which they have adopted mordern complexities inspires me.

If you ever have been in Benares, then you are ought to know the Ramnagar bridge, the nosering that adorns Ganga, which during sun set appears to be draped in shades of red and orange like a long flow of Banarasi saree. On one side this bridge is Ramnagar fort and to its opposite are the Ghats aligned like a crescent.

That sunday could have been just like all other Sundays, which I used to spent sleeping but this time around it was something different. I wasn’t alone and wasn’t spending my sunday in solitude. I had got myself a companion which my other friends already had, a ravishing beauty, who was going to satisfy all my needs and pleasures. I had got myself a brand new and glittering cycle!!

I was itching to do something adventurous now. Park, one of my two friends along with Sucheta, who were also my partners for the forthcoming ride, suggested an idea to go to the Ramnagar bridge riding on our companions. It matched my adventurous instincts and then I convinced Sucheta to come along with us.

Moments later the three of us were riding together frivolously, swirling and dodging around in traffic. The real ride still awaited us, the adventure was going to begin.

While pedaling against the slope to reach the zenith, there came a point in the midst when our legs had given up, the din of horns increased, we were hindering their drive and pace. Each and every pedal was an excruciating task. Our body now also had given up, the mind had already announced it’s decision to return back but inside our bosom, was a burning desire to reach on the top of that bridge. I was recollecting my memories of the last scene of “Joh jeeta wahi sikander”, and in that moment of invigoration, I raised my figure and started pedaling. Soon I realised I wasn’t Aamir khan and this wasn’t a cycling track. Slow pedaling was all that I could do or rather my legs permitted me to do.

Now station of our cycle train was getting closer. Just the imagination of the picturesque motivated us and made us pretermit all our pains and problems.

Moments later when we reached our destination and got down from our cycles, our legs were shaking and visages glittering.

The mind had abruptly refused to believe what the eyes were viewing. The ginormous bridge standing atease against the reverential Ganga. Each and every drop of Ganga whispered the secrets it had gathered across all the Ghats, to the fort of Ramnagar. Ganga like a younger sister chirped and played and the fort like an elder brother purred to every utterance of her. The setting sun was displaying it’s array of different colours. The bridge gave this scene a perfect frame to capture. Every city has its heaven, Benares had its here, right now.

The clock kept ticking, we in tranquility didn’t even realise that we had already surpassed our time limits. We picked up our cycles, though not ready to part away from this vista. The call of our clocks had to be heard. Turning our cycles we bid our adieu.

The path which earlier had offered all sorts of hurdles now embraced us with open arms. The wind that was against, now kissed our foreheads. The wheels were rolling and the sun was setting, we were ready to elope together in the hustle and bustle again.

CHIlD IN SPOTLIGHT: Performance, Sexuality and Childhood.

In context to objectification of child and innocence on screens, very little attention is being paid on violence, that their childhood is thrusted into. The honing they go through grinds their childhood. The labour that they go through, working 8-9 hours in enaction of the ideas and emotions which their young credulous brains have no idea about, like Avika Gor “Anandi” playing the role of a wife in “Sasural Simar Ka” inspite of being just 15 or 16 years old or Ruhanika Dhawan “Ruhi” a 7-8 year old child helping her parents in their plot against the antagonist. An early access to all the lavishness and popularity also shows them, that side of the coin of which they should be oblivious about, Macaulay Culkin, of home alone fame, becoming a drug addict is the best example of it. The struggle of this object of innocence begins after the spotlight fades out.

Imbibition of a sense of divergent superiority brings a downstream in their behaviour, rigid towards accepting any mediocre thing in life. At a very tender age they become a symbol of sexuality, as a little thought is put on perception neuroscience and how a human brain perceives bodies and objectifies them, like the current youth sensation Siddharth Nigam is made to flaunt his body in most of the television shows. The social delineation becomes the subject of apprenhension. The exigence of spotlight keeps triggering in the subconscious mind and knowledge and education becomes an irrelevant criteria after that.